CBSE Class 10 Hindi (Course B) • Sanchayan Part-2
पाठ का सार और मूल भाव (Theme/Core Message):
'हरिहर काका' कहानी समाज में तेज़ी से गिरते हुए 'मानवीय मूल्यों' (Human Values), पाखंड (Hypocrisy), और 'ज़मीन-जायदाद' (Property) के लालच की कड़वी सच्चाई का पर्दाफाश करती है। इस कहानी में दिखाया गया है कि कैसे स्वार्थ और पैसे के लालच में इंसान के 'खून के रिश्ते' (Blood Relations - भाई) और 'धर्म के ठेकेदार' (महंत / Religious Leaders) दोनों ही क्रूर और हिंसक (Violent) हो जाते हैं। कहानी के केंद्र में एक वृद्ध (Old) और बेऔलाद व्यक्ति 'हरिहर काका' हैं, जिनके 15 बीघे खेत के लिए उनके अपने भाई और गाँव के मंदिर का महंत उनका जीवन नरक बना देते हैं। कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि आज के समाज में इंसानियत से ज्यादा 'पैसे' की अहमियत हो गई है।
कहानी का 'लेखक' (Narrator) गाँव में हरिहर काका का पड़ोसी है। बचपन से ही हरिहर काका ने लेखक को अपने बच्चे की तरह बहुत प्यार किया है। वे दोनों एक-दूसरे से अपनी हर बात साझा (Share) करते थे। लेकिन पिछले कुछ समय से हरिहर काका एकदम 'मौन' (शांत / Silent) हो गए हैं। उनके साथ कई ऐसी भयानक घटनाएँ घटी हैं जिन्होंने उन्हें अंदर तक तोड़ दिया है और उन्हें लगता है कि "अब कोई किसी का नहीं है।" लेखक उनकी इसी 'चुप्पी' और दर्दनाक दास्तान को इस कहानी में बताता है।
गाँव में एक बहुत बड़ा और समृद्ध मंदिर है जिसे 'ठाकुरबारी' (ठाकुर जी/भगवान का मंदिर) कहा जाता है। गाँव के लोग भगवान में बहुत श्रद्धा (Faith) रखते हैं और अपनी हर सफलता का श्रेय ठाकुर जी को देते हैं। इसी अंधविश्वास के कारण लोग अपनी ज़मीन और संपत्ति ठाकुरबारी के नाम कर देते हैं। इस वजह से ठाकुरबारी के पास बहुत सारी ज़मीन और संपत्ति इकट्ठी हो गई है। ठाकुरबारी के 'पुजारी और महंत' (Priests) कोई काम-काज नहीं करते, बल्कि मुफ़्त का खाते हैं, मज़े उड़ाते हैं और लोगों की संपत्तियों पर नज़र रखते हैं।
हरिहर काका चार भाई हैं। बाकी तीनों भाइयों का भरा-पूरा परिवार है (पत्नियां और बच्चे हैं)।
हरिहर काका की दो शादियाँ हुई थीं, लेकिन दोनों ही पत्नियों का बिना किसी संतान के निधन
(Death) हो गया। इसलिए हरिहर काका 'विधुर' (Widower) और 'निःसंतान' (Childless) हैं।
चारों भाइयों के पास कुल 60 बीघे ज़मीन है, जिसमें से हरिहर काका के हिस्से में 15 बीघे
ज़मीन आती है। हरिहर काका अपने भाइयों के परिवार के साथ ही रहते हैं।
शुरुआत में भाइयों ने हरिहर काका की देखभाल की, लेकिन धीरे-धीरे सब बदल गया।
भाइयों की पत्नियाँ हरिहर काका का ध्यान नहीं रखती थीं। जब काका बीमार पड़ते, तो कोई उन्हें
पानी पूछने वाला तक नहीं होता था। उन्हें खाने में बचा-खुचा या रूखा-सूखा खाना (रूखी रोटियां) दिया जाने लगा।
एक दिन (Turning Point): जब हरिहर काका के घर में मेहमान आए, तो घर में बहुत अच्छा और
स्वादिष्ट भोजन बना। लेकिन किसी ने हरिहर काका से नहीं पूछा और उन्हें वही रूखा-सूखा खाना परोस दिया गया। इससे
हरिहर काका को बहुत तेज़ गुस्सा (क्रोध) आया और वे भाइयों व उनकी पत्नियों को खूब खरी-खोटी
(गालियां) सुनाने लगे और घर से बाहर निकल गए।
ठाकुरबारी के 'महंत' की नज़र हमेशा से हरिहर काका की 15 बीघे ज़मीन पर थी। जैसे
ही उसे भाइयों की लड़ाई के बारे में पता चला, वह तुरंत मौका देखकर हरिहर काका के पास पहुँचा।
महंत ने हरिहर काका को बहुत प्यार और सहानुभूति (Sympathy) का नाटक दिखाया। उसने काका को
समझाया कि "यह दुनिया स्वार्थी है, तुम्हारे भाई सिर्फ तुम्हारी ज़मीन के लिए तुम्हें घर में रखे हुए
हैं।"
महंत ने हरिहर काका को स्वर्ग (Heaven) और मोक्ष (Salvation) का लालच दिया और कहा कि वे अपनी ज़मीन
'ठाकुरबारी' (भगवान) के नाम लिख दें, जिससे उनका नाम अमर हो जाएगा।
महंत उन्हें आदर से ठाकुरबारी ले गया और वहाँ उन्हें बहुत अच्छा-अच्छा भोजन कराया और खूब सम्मान दिया।
जब हरिहर काका के भाइयों को यह बात पता चली कि काका ठाकुरबारी चले गए हैं, तो उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई
(उन्हें 15 बीघे ज़मीन हाथ से जाती दिखी)।
अगले ही दिन, भाई ठाकुरबारी पहुँच गए। उन्होंने हरिहर काका के पैरों में गिरकर बहुत 'माफ़ी
माँगी', अपनी पत्नियों की गलती मानी और रो-रोकर काका को वापस घर चलने के लिए मना लिया।
घर आने पर भाइयों ने काका की ऐसी 'ख़ातिरदारी' और 'सेवा' शुरू कर दी जैसे वे कोई राजा हों।
उन्हें हर सुख-सुविधा दी जाने लगी। लेकिन काका यह समझ चुके थे कि यह सारा प्यार सिर्फ उनसे ज़मीन लिखवाने
के लिए है।
जब महंत को लगा कि हरिहर काका आसानी से ज़मीन ठाकुरबारी के नाम नहीं करेंगे, तो उसने अपना 'क्रूर और असली रूप'
दिखा दिया।
एक रात महंत ने अपने गुंडों और पुजारियों के साथ मिलकर हरिहर काका का घर से 'अपहरण'
(Kidnapped) करवा लिया।
ठाकुरबारी में ले जाकर गुंडों ने हरिहर काका के 'हाथ-पैर बाँध दिए', 'मुँह में कपड़ा ठूँस दिया' और उनके साथ
बहुत मार-पीट की।
महंत ने डरा-धमकाकर सादे और लिखे हुए काग़ज़ों (Stamp papers) पर ज़बरदस्ती हरिहर काका के 'अंगूठे के
निशान' लगा लिए। धर्म की आड़ में महंत ने राक्षसों (Demons) जैसा काम किया।
जब हरिहर काका के भाइयों को अपहरण का पता चला, तो वे पुलिस लेकर ठाकुरबारी पहुँचे। पुलिस ने बड़ी मुश्किल से
हरिहर काका को आज़ाद कराया। हरिहर काका ने महंत की पूरी सच्चाई और ज़बरदस्ती अंगूठे लगवाने की
बात भाइयों को बता दी।
लेकिन इसके बाद, भाइयों का स्वभाव भी बदल गया। जब उन्होंने देखा कि महंत ने ज़बरदस्ती
अंगूठे लगवा लिए हैं, तो भाइयों ने खुद हरिहर काका पर दबाव डालना शुरू कर दिया कि वे अपनी पूरी
ज़मीन जीते-जी भाइयों के नाम कर दें (ताकि महंत से खतरा न रहे)।
जब हरिहर काका ने जीते-जी ज़मीन किसी के नाम करने से 'साफ़ इनकार' कर दिया, तो उनके सगे
भाइयों ने भी उनके साथ वही सुलूक (व्यवहार) किया जो महंत ने किया था। भाइयों ने भी हरिहर काका
को पीटा (मार-पीट की), हथियारों से डराया और ज़बरदस्ती ज़मीन लिखवाने की कोशिश की।
ईश्वर की कृपा से हरिहर काका इस बार भी बच गए और पुलिस की सुरक्षा में आ गए।
लेकिन इन भयानक घटनाओं (सगे भाइयों और धर्मगुरु दोनों द्वारा दिए गए धोखे और हिंसा) ने हरिहर काका
को अंदर से पूरी तरह 'तोड़ दिया' और 'सुन्न' (Traumatized) कर दिया।
अब वे गाँव के एक अकेले घर में 'पुलिस की सुरक्षा' (Police protection) में रहते हैं।
उन्होंने 'बोलना बिल्कुल बंद' कर दिया है। उनका मन इस दुनिया की स्वार्थपरता से भर चुका है और
वे समझ चुके हैं कि 15 बीघे ज़मीन ही उनके लिए उनका मौत का सामान बन गई है और "यहाँ कोई खून का रिश्ता या
धर्म, ज़मीन-जायदाद से बड़ा नहीं है।"
1. हरिहर काका: कहानी के मुख्य पात्र हैं। वे एक सीधे-सादे, वृद्ध और निःसंतान किसान हैं। वे अपने भाइयों से बहुत प्यार करते हैं, लेकिन जब उन्हें पता चलता है कि समाज में प्यार केवल 'ज़मीन' के लिए किया जाता है, तो उनका भ्रम टूट जाता है। वे बहुत 'दृढ़निश्चयी' (Determined) भी हैं क्योंकि इतनी यातनाएं सहने के बाद भी वे जीते-जी अपनी ज़मीन किसी के नाम न करने के फ़ैसले पर डटे रहते हैं। अंत में वे एकाकी (Lonely) और मौन हो जाते हैं।
2. ठाकुरबारी का महंत: महंत धर्म की आड़ में छिपा हुआ एक बहुत ही जालसाज़, स्वार्थी, पाखंडी और लालची (Greedy & Hypocrite) इंसान है। वह लोगों की धार्मिक भावनाओं का फ़ायदा उठाकर उनकी ज़मीन हड़पता है। हरिहर काका की ज़मीन हड़पने के लिए वह किसी भी हद (अपहरण और मार-पीट) तक जाने को तैयार है। वह समाज में फैले 'भ्रष्ट धार्मिक ठेकेदारों' का प्रतीक है।
3. हरिहर काका के भाई: वे भी पूरी तरह से 'स्वार्थी और लालची' (Selfish) हैं। उनका हरिहर काका से कोई भावनात्मक लगाव (Emotional attachment) नहीं है। वे केवल काका की 15 बीघे ज़मीन हड़पना चाहते हैं। ज़मीन के लिए वे पहले माफ़ी माँगते हैं और सेवा का नाटक करते हैं, लेकिन जब काका ज़मीन नहीं देते, तो वे भी महंत की तरह 'मार-पीट और हिंसा' पर उतर आते हैं। वे इस बात का सबूत हैं कि पैसा खून के रिश्तों से भी बड़ा हो गया है।
प्रश्न 1: हरिहर काका को महंत और अपने भाई एक ही श्रेणी (Category) के क्यों लगने लगे थे?
उत्तर: हरिहर काका को महंत और अपने सगे भाई दोनों 'एक ही श्रेणी' (एक
जैसे) के इसलिए लगने लगे थे क्योंकि दोनों का ही एकमात्र उद्देश्य काका की '15 बीघे ज़मीन' हड़पना
था। दोनों में से किसी को भी काका की चिंता या उनसे भावनात्मक लगाव नहीं था।
महंत ने भी ज़मीन के लालच में काका का अपहरण कराया और उनके साथ मार-पीट करके ज़बरदस्ती अंगूठे लगवाए। और
जब काका ने अपने भाइयों के नाम भी जीते-जी ज़मीन करने से मना कर दिया, तो उनके सगे भाइयों ने भी उनके साथ वही
क्रूरता और 'मार-पीट की' जो महंत ने की थी। दोनों ही स्वार्थी और हृदयहीन थे।
प्रश्न 2: ठाकुरबारी के प्रति गाँव वालों में अपार श्रद्धा थी, क्या आप इसे सही मानते हैं? कारण सहित बताएँ।
उत्तर: ठाकुरबारी (मंदिर) के प्रति गाँव वालों की अपार श्रद्धा
पूरी तरह से 'अंधविश्वास' (Blind Faith) थी और उसे सही नहीं माना जा सकता।
गाँव के लोग अपनी हर सफलता (अच्छी फसल, नौकरी मिलना आदि) का श्रेय ठाकुर जी को देते थे, जो कि उनका
अज्ञान था। इसी अंधश्रद्धा का फायदा ठाकुरबारी के 'महंत और पुजारी' उठाते थे। वे धर्म के नाम पर पाखंड करते
थे, मुफ़्त में ऐश करते थे और लोगों की कीमती ज़मीन भगवान के नाम पर अपने कब्ज़े में कर लेते थे। 'हरिहर काका'
के साथ हुआ क्रूर व्यवहार इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि ठाकुरबारी धर्म का नहीं, बल्कि 'लालच, छल-कपट और
अपराध' का अड्डा बन चुकी थी।
प्रश्न 3: हरिहर काका ने जीते-जी अपनी ज़मीन किसी के नाम न लिखने का कठोर निर्णय क्यों लिया?
उत्तर: हरिहर काका ने ऐसा कठोर निर्णय इसलिए लिया क्योंकि उन्होंने अपने
ही गाँव के कई ऐसे लोगों (उदाहरण- रमेशर की विधवा) की दुर्दशा देखी थी, जिन्होंने जीते-जी अपनी ज़मीन अपने
रिश्तेदारों के नाम कर दी थी और बाद में उन रिश्तेदारों ने उन्हें दो वक़्त की रोटी तक नहीं दी और उन्हें
कुत्ते की मौत मरना पड़ा।
हरिहर काका समझ गए थे कि जब तक उनके पास 15 बीघे ज़मीन है, तभी तक समाज, भाई या महंत उनकी परवाह
करेंगे। अगर वे जीते-जी ज़मीन दे देंगे, तो उन्हें बुढ़ापे में घुट-घुट कर मरना पड़ेगा।
प्रश्न 4: कहानी के अंत में हरिहर काका के 'मौन' (शांत) हो जाने का क्या कारण था?
उत्तर: कहानी के अंत में हरिहर काका बिल्कुल 'मौन/गुमसुम' हो गए थे। इसका
कारण यह था कि उन्हें दो तरफ़ा और बहुत गहरा मानसिक आघात (Trauma/धोखा) लगा था।
पहले, धर्म के नाम पर 'महंत' ने उनका अपहरण किया और यातनाएं दीं। दूसरा सबसे बड़ा दुःख यह था कि
जिन 'सगे भाइयों' को काका अपने बच्चों की तरह मानते थे, उन भाइयों ने भी ज़मीन के लालच में
उनकी 'जान लेने' की कोशिश की। इस 'घोर स्वार्थ और खून के रिश्तों में आए क्रूर पतन' को देखकर हरिहर काका का
'मानवता और रिश्तों पर से पूरा भरोसा उठ गया था', इसलिए वे खामोश हो गए।